बारां परिषद के उपाध्यक्ष सूरजमल मेघवाल कवि द्वारा बाबा साहेब पर लिखी कविता


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टेर,,  14,अप्रेल आई जी या  आज
नमन बाबा साहब न करां

आपण शीश झुकाल्यां जी आज
नमन बाबा भीम न क रां 
भीम न करां जी बाबा साहब न करां
अमर होग्यो जी यांको नाम 
नमन बाबा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

1,काईं छ दलित और काईं च खता
वासूं ज्यादा जाणकुण याहीं तो बतां 
दलिता क लेखह यानह उठाई आवाज 
संगठित करद्द्यो र यानह यो समाज 
गुण करां जी याकां मा न 
नमन बाबा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

2,गरीबी दलिती और मारा मारी म 
पढ़बा कीठान ली छी छोकी मन म 
पढ़ लिखकर यानह सविंधान लिक्यो
दलितां क लेखह याहन अधिकार जी दियो 
अमर होग्यो जी यांको नाम 
नमन बाबा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

3,14 अप्रेल को दन छो बडो
दलितां को सूरज ईं दन ही उग्यो 
संगठित संगर्ष और शिक्षा को नारों तो दियो 
दलितां को जी याहन उधार तो कियो
यांनह बढ़ायो समाज को मा न
नमन बाबा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

4,कारवो बढ़ायो छो जे यान ह आगह
कभी न रह पायो जी यो पाछ ह 
राजनीति म यानह तां मत भुलज्यो 
नियम सँजोर तां मन म राखज्यो 
आपणा यही तो छ जी भगवान 
नमन बाबा साहब,,,,,,,,,,,,,,,,

14 अप्रेल आई जी आज 
नमन बाबा साहब न क रां 
साहब न करां जी बाबा भीम न करां
आपण शीश झुकल्यां जी आज 
नमन बाबा साहब,,,,,,,,,,,,,,,

      स्वरचित गीत
कवि सूरजमल मियाड़ा
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बारां  बाबा साहेब की जीवनी पर कवि नाथूलाल मेघवाल द्वारा लिखी कविता


कविता विपरीत थे हालात सभी

दलितों का जो बना मसीहा, वो धरती पर आया था।
विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
1
मूल गांव महाराष्ट्र पूर्वज, महू छावनी आए थे। 
आंगल सेना करें नौकरी, जीवन यही बसाए थे। 
पिता हुए सकपाल तुम्हारे, माता भीमाबाई थी। 
भीमराव संतान चौदवी, आंगन खुशियां आई थी। 
जिस जाति में जन्म लिया था,  जात अछूती जानी थी। 
मान न देते इन लोगों को, कैसी वो मनमानी थी। 
प्रतिभाशाली होने पर भी, जात बनी अवरोधक थी। 
दिया नहीं प्रवेश कहीं भी, हीन भाव की ध्योतक थी। 
बाहर बैठे शिक्षा पाई, तम में दीप जलाया था। 
विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
2
सात नवंबर सन उन्नीस सौ, पढ़ने पहली बार गए। 
देख प्रतिभा लगा यूं उनकी, जैसे बाजी मार गए। 
हाई स्कूल पढ़ने खातिर, मुंबई को प्रस्थान किया। 
स्नातक तो पढ़ें यहीं पर, दलित वर्ग को मान दिया। 
गए विदेशों में वो पढ़ने, छात्रवृत्तियां पाई थी।
 गायकवाड बड़ौदा द्वारा, जिनको यह पहुंचाई थी।
 अमेरिका इंग्लैंड गए वो, पीएचडी की शिक्षा ली। 
कई डिग्रियां लेकर वापिस, भारत मां की भिक्षा ली। 
चमक बिखेरी सकल विश्व में, सारा जग चौकाया था।
 विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
3
करुण दशा दलितों की ऐसी,कलम नहीं लिख पाएगी। 
लिखते लिखते अश्रु धार से, ये आंखें भर जाएगी। 
छुआछूत का आलम पसरा, दलितों से भू आती थी। 
अगर पडे परछाई इनकी, वो चीजें छू जाती थी। 
जलाशयों से पानी पीना, मुख धारा से दूर किया। 
अपमानित जीवन जीने का, सबने गहरा घूंट पिया। 
थूक नहीं दे दलित धरा पर, हंडिया गर्दन टांगी थी।
रहे नहीं पद चिन्ह कही पर, कमर खजूरी बांधी थी।
घृणा हुई पशुओं से बदतर, वेद शास्त्र सब गाया था। 
विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
4
गौतम बुद्ध व दास कबीरा, संत हुए रैदासा थे। 
खूब मिटाया सबने लेकिन, पाते सभी निराशा थे। 
इसी वर्ग सावित्री फूले, अपना बिगुल बजाया था। 
जन-जन के दुख हरने मानो, भीमराव तब आया था। 
अपनी शिक्षा बुद्धि बल से, जलाशयों को मुक्त किया। 
तोड़ी सदियों की कुरीतियां, कानूनों को सख्त किया। 
धरने दिए आमरण अनशन, जेलों में भी आप गए। 
उसका ही परिणाम हुआ तुम, चली हवा को भांप गए।
असं‌ख्यक दलित लोगों का यूं ,सोया भाग जगाया था। 
विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
5
कमी नहीं प्रतिभा की जग में, जातिवाद से हारी थी। 
अवसर दिए नहीं दलितों को, भेदभाव की मारी थी। 
कुछ लोगों ने किया दुसाहस, जग में आगे आने का। 
रचे गए षड्यंत्र अनेकों ,उनको भला मिटाने का। 
भीमराव ने अपने पथ में, पग-पग पीड़ा झेली थी। 
उच्च पदों पर रहे भले ही, हर पल वही पहेली थी। 
पढ़े लिखें लोगों ने भी जब, इसे नहीं स्वीकार किया। 
बीड़ा तभी उठाया ऐसा, इसको ही हथियार किया। 
संधान हुआ नभ गूंज उठा, ऐसा तीर चलाया था। 
विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
6
ना केवल वह दलित हितैषी, राजनीति विश्लेषक था। 
कानूनों का था जो ज्ञाता, बहुत बड़ा उपदेशक था। 
महिलाओं के अधिकारों का, सदा रहा संरक्षक था।
 मनुवादी कुछ गलत रूढ़ियां, पर फन फैला तक्षक था।
जिसकी प्रतिभा का दुनियां ने, दिल से लोहा माना था।
 मानवता का है हमराही, सब ने उसको जाना था। 
दुनियां के कानून पढ़े फिर, भारत का संविधान लिखा। 
सकल विश्व का लोकतंत्र में,समरसता का मान लिखा। 
ऐसा काम किया है जग में, सबके मन को भाया था। 
विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
7
आजादी के इन सालों में ,कुछ परिवर्तन आया है। 
टूटी है वो जंगी बेड़ियां, दलित यहां मुस्काया है।
 लेकिन अब भी कुछ लोगों को, बात समझ ना आई है। 
जाति पात में रहे उलझ कर, रीत वही अपनाई है। 
भारत मां का बच्चा-बच्चा, वंदे मातरम् बोलेगा। 
देश बनेगा विश्व गुरु फिर ,राज दिलों के खोलेगा। 
छोड़े सारे भेदभाव हम,इक दूजे से प्यार करें। 
हम सब भारत मां के बेटे, भारत मां जयकार करें।
 जिसके कर्मों की पूंजी ने भारत रत्न दिलाया था।
 विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।
8
वेद शास्त्र उपनिषद गीता, पढ़े ग्रंथ तब सारे थे। 
दलित विरोधी सूत्र मनुस्मृति, बाण विषैले मारे थे। 
सब देशों की रीति नीति के, लेखे जोखे देखे थे।
बदल गया रुख देव वाद से, दूर उठा कर फेंके थे।
लाखों लोग उपस्थित थे तब,मनुस्मृति का दहन किया। 
त्यागा हिंदू धर्म तभी से, बौद्ध धर्म को रहन किया।
छोड़ गए फिर इस दुनियां को, जैसे युग का अंत हुआ। 
लोग समर्थक इतने जिनके, एक नया फिर पंथ हुआ। 
स्वप्न नये भारत का देखा, सबको गले लगाया था।
 विपरित थे हालात सभी पर,फिर भी कदम बढ़ाया था।

नाथूलाल मेघवाल बारां


छीपाबडौद बारां परिषद संस्थापक नन्दलाल केसरी द्वारा बाबा साहेब जयंती पर लिखा गीत



जय हो बाबा भीम महान !
बना दियो भारत रो सँविधान!!

शिक्षा को मूल मंत्र बताया, 
संघर्ष को हथियार बनाया,
युग युग तेरी रहेगी शान
जय हो बाबा भीम महान,
बना दियो भारत रो सँविधान.....

राजा रंक का भेद मिटाया,
हरिजन भी राजा बनवाया,
विश्व मे भारत का बढ़ाया मान,
जय हो बाबा भीम महान,बना...

 चुनाव प्रणाली ऐसी अपनाई,
आमजन ने भी सत्ता पाई,
याद करेगा हमेशा ये जहान,
जय हो बाबा भीम महान,बना ..

जाति पन्थ का भेद मिटाया,
कोमी एकता का पाठ पढ़ाया,
गरीब करेगे हमेशा गुणगान,
जय हो बाबा भीम महान, बना...

सबको ही अधिकार दिलाया,
समरसता से रहना सिखाया,
बढ़ाया सबका ही सम्मान,
जय हो बाबा भीम महान,बना....

संघर्ष को ही बनाया नारा,
गरीबो के आप बने सहारा,
आप तो हो देश की जान,
जय हो बाबा भीम महान,
बना दियो भारत रो सँविधान......
🙏👏👏👏👏👏👏🙏

नन्दलाल केसरी छीपाबडौद