अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण)अधिनियम, 1989 एवं नियम, 1995 के नियम 12 (4) के अन्तर्गत देय राहत

राजस्थान सरकार के पत्रांक एक 11(67)/ आर एण्ड पी/ सकवि/4377 दिनांक 11.06.03 द्वारा अनुसुचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण ) नियसम 1995 के प्रावधानों का यथावत लागू कर रिया गया है ।
अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के अन्र्तगत आने वाले अत्याचारों से पीडि़त व्यक्तियों को नियम 1995 की धारा 11 एवं धारा 12(4) के अन्तर्गत् राहत देने का प्रावधान किया गया है। समस्त जिला कलक्टरों को आदेशित किया गया है कि वे इन नियमों के अन्तर्गत् आने वाले अत्याचारों के सभी प्रकरणों में राहत राशि प्रदान किए जाने की व्यवथा करेंगे ।

(अ) अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1995 की धारा 11 के अन्तर्गत अत्याचार पीडि़त व्यक्तियों, उनके आश्रितों एवं गवाहों को आने जाने हेतु यात्रा व्यय, पोषण व्यय तथा आहार व्यय दिए जाने के निम्न प्रावधान है-

1. परिवहन हेतु भाड़ा अथवा खर्चा संबंधित व्यक्तियों के निवास से संबंधित न्यायालय/कार्यालय तक जाने के लिए साधारण श्रेणी के रेल अथवा बस किराए के बराबर होगा, जो संबंधित न्यायालय/कार्यालय द्वारा उपस्थिति सत्यापन किए जाने पर देय होगा ।
2. भरण पोषण भत्ता राज्य की तत्समय लागू न्यूनतम मजदूरी दर के बराबर प्रतिदिन के आधार पर उपस्थिति सत्यापन हाने पर दिया जाएगा तथा
3. आहार व्यय हेतु भी उपस्थिति का सत्यापन होने पर 25/- रूपये प्रतिदिन की दर से भत्ता दिया जाएगा।

(ब) अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1995 की धारा 12 (4) के अन्तर्गत अत्याचार पीडिंत व्याक्यिों और उनके आश्रितों को निम्न प्रकार से राहत देय होगी

क्र.सं.अपराधराहत राशि
1अखाद्य या घृणाजनक पदार्थ पीना या खाना (धारा 3(1) (1)/ क्षति पहंुचाना, अपमानित करना या क्षुब्ध करना (धारा 3 (1) (2)/ अनादरसूचक कार्य (धारा 3 (1) (3)) के तहतप्रत्येक पीडि़त को अपराध के स्वरूप और गंभीरता को देखते हुए 25000 रू.या उससे अधिक और पीडि़त व्यक्ति द्वारा अपमान, क्षति तथा मानहानि सहने के अनुपात में भी होगा। दिया जाने वाला भुगतान निम्नलिखित होगाः- (1) 25 प्रतिशत जब आरोप-पत्र न्यायालय को भेजा जाए। (2) 75 प्रतिशत जब निचले न्यायालयों द्वारा दोष सिद्ध ठहराया जाए।
2सदोष भूमि अभिभोग में लेना या उस पर कृषि करना आदि (धारा 3 (1) (4))/भूमि परिसर या जल से संबंधित (धारा 3(1) (5)) के तहतअपराध के स्वरूव और गंभीरता को देखते हुए कम से कम 25000 रू. या उससे अधिक भूमि/परिसर/जल की आपूर्ति जहां आवश्यक हो, सरकारी खर्च कर पुनः वापस की जाएगी। जब आरोप पत्र न्यायालय को भेजा जाए पूरा भुगतान किया जाए।
3बेगार या बलात्श्रम या बंधुआ मजदूरी (धारा 3 (1) (6)) के तहतप्रत्येक पीडि़त व्यक्ति को कम से कम 25000 रू./प्रथम सूचना रिपोर्ट की स्टेज पर 25 प्रतिशत और 75 प्रतिशत निचले न्यायालय में दोष सिद्ध होने पर।
4मतदान के अधिकार के संबंध में (धारा 3 (1) (7)) के तहतप्रत्येक पीडि़त व्यक्ति को 20000 रू. तक जो अपराध के स्वरूप और गंभीरता पर निर्भर है।
5मिथ्या, द्वेष पूर्ण या तंग करने वाली विधिक कार्यवाही (धारा 3 (1) (8))/ मिथ्या या तुच्छ जानकारी (धारा 3 (1) (9)) के तहत25000 रू. या वास्तविक विधिक व्यय और क्षति की प्रतिपूर्ति या अभियुक्त के विचारण की समाप्ति के पश्चात् जो भी कम हो।
6अपमान, अभित्रास (धारा 3 (1) (10)) के तहतअपराध के स्वरूप पर निर्भर करते हुए प्रत्येक पीडि़त व्यक्ति को 25000 रू. तक 25 प्रतिशत उस समय जब आरोप पत्र न्यायालय को भेजा जाए और शेष दोष सिद्ध होने पर।
7किसी महिला की लज्जा भंग करना (धारा 3 (1) (11))/ महिला का लैंगिक शोषण (धारा 3 (1) (12)) के तहतअपराध के प्रत्येक पीडि़त को 100000 रू. । चिकित्सा जांच के पश्चात् 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किया जाये तथा शेष 50 प्रतिशत विचारण की समाप्ति पर किया जाए ।
8पानी गन्दा करना (धारा 3 (1) (13)) के तहत100000 रू. तक जब पानी को गन्दा कर दिया जाए तो उसे साफ करने सहित या सामान्य सुविधा को पुनः बहाल करने की पूरी लागत। उस स्तर पर जिस पर जिला प्रशासन द्वारा ठीक समझा जाए भुगतान किया जाए।
9मार्ग के रूढि़जन्य अधिकार से वंचित करना (धारा 3 (1) (14)) के तहत100000 रू. तक या मार्ग के अधिकार को पुनः बहाल करने की पूरी लागत और जो नुकसान हुआ है, यदि कोई हो, उसका पूरा प्रतिकार। 50 प्रतिशत जब आरोप पत्र न्यायालय को भेजा जाए और 50 प्रतिशत निचले न्यायालय में दोष सिद्ध होने पर।
10किसी को निवास स्थान छोड़ने पर मजबूर करना (धारा 3 (1) (15)) के तहतस्थल बहाल करना। ठहराने का अधिकार और प्रत्येक पीडि़त व्यक्ति को 25000 रू. का प्रतिकार तथा सरकार के खर्च पर मकान का पुनर्निर्माण यदि नष्ट किया गया हो। पूरी लागत का भुगतान जब निचले न्यायालय में आरोप पत्र भेजा जाए।
11मिथ्या साक्ष्य देना (धारा 3 (2) (1) और (2) ) के तहतकम से कम 100000 रू. या उठाए गए नुकसान या हानि का पूरा प्रतिकार 50 प्रतिशत का भुगतान जब आरोप पत्र न्यायालय में भेजा जाए और 50 प्रतिशत निचले न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने पर।
12भारतीय दंड संहिता के अधीन 10 वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध करना (धारा 3 (2)) के तहतअपराध के स्वरूप और गम्भीरता को देखते हुए प्रत्येक पीडि़त व्यक्ति को या उसके आश्रित को कम से कम 50000 रू. यदि अनुसूची में विशिष्ट। अन्यथा प्रावधान किया हुआ हो तो इस राशि में अन्तर होगा।
13किसी लोकसेवक के हाथों उत्पीड़न (धारा 3 (2) (7)) के तहतउठाई गई हानि या नुकसान का पूरा प्रतिकार, 50 प्रतिशत का भुगतान जब आरोप पत्र न्यायालय में भेजा जाए और 50 प्रतिशत का भुगतान जब निचले न्यायालय में दोष सिद्ध हो जाए, किया जाएगा।
14निर्योग्यता। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार की समय-समय पर यथा संशोधित अधिसूचना सं. 4.2.83, एच.डब्ल्यू- 3 तारीख 6.8.1986 में शारीरिक और मानसिक निर्योग्यताओं का उल्लेख किया गया है। अधिसूचना की एक प्रति अनुबन्ध-2 पर है।
(क) 100 प्रतिशत असमर्थतता (1) परिवार का न कमाने वाला सदस्य को
(2) परिवार का कमाने वाला सदस्य को
(ख) जहां असमर्थता
100 प्रतिशत से कम है।
अपराध के प्रत्येक पीडि़त को कम से कम 100000 रू., 50 प्रतिशत प्रथम सूचना रिपोर्ट पर और 25 प्रतिशत आरोप पत्र पर और 25 प्रतिशत निचले न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने पर। अपराध के प्रत्येक पीडि़त को कम से कम 200000 रू., 50 प्रतिशत प्रथम सूचना रिपोर्ट/चिकित्सा जांच पर भुगतान किया जाए और 25 प्रतिशत जब आरोप पत्र न्यायालय को भेजा जाए तथा 25 प्रतिशत निचले न्यायालय में दोष सिद्ध होने पर। उपर्युक्त क (1) और (2) में निर्धारित दरों को उसी अनुपात में कम किया जाएगा, भुगतान के चरण भी वही रहेंगे। तथापि न कमाने वाले सदस्य को 15000 रू. से कम नहीं और परिवार के कमाने वाले सदस्य को 30000 रू. से कम नहीं होगा।
15हत्या/ मृत्यु
(क) परिवार का न कमाने वाला सदस्य होने पर
(ख) परिवार का कमाने वाला सदस्य होने पर
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प्रत्येक मामले में कम से कम 100000 रू., 75 प्रतिशत पोस्टमार्टम के पश्चात् और 25 प्रतिशत निचले न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने पर। प्रत्येक मामले में कम से कम 200000 रू., 75 प्रतिशत का भुगतान पोस्टमार्टम के पश्चात् और 25 प्रतिशत निचले न्यायालय में दोष सिद्ध होने पर।
16हत्या, मृत्यु, नरसंहार, बलात्संग, सामूहिक बलात्संग, गैंग द्वारा किया गया बलात्संग, स्थायी असमर्थता और डकैतीउपर्युक्त मदों के अन्र्तगत भुगतान की गई राहत की रकम के अतिरिक्त राहत की व्यवस्था अत्याचार की तारीक्ष से तीन माह के भीतर निम्नलिखित रूप से की जाएः- (1) अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मृतक की प्रत्येक विधवा और/या अन्य आश्रितों को 1,000 रू. प्रति मास की दर से, या मृतक के परिवार के परिवार के एक सदस्य को रोजगार या कृषि भूमि, एक मकान यदि आवश्यक होता तत्काल खरीद द्वारा (2) पीडि़तों के बच्चों की शिक्षा और उनके भरण-पोषण का पूरा खर्चा/ बच्चों को आश्रम, स्कूलों/आवासीय स्कूलों में दाखिल किया जाए। (3) तीन माह की अवधि तक बर्तनों, चावल, गेहूँ, दालों, दलहनों आदि की व्यवस्था।
17पूर्णतया नष्ट करना/ जला हुआ मकानजहां मकान को जला दिया गया हो या नष्ट कर दिया गया हो। वहां सरकारी खर्च पर ईंट पत्थर के मकान का निर्माण किया जाए या उसकी व्यवस्था की जाए।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम1995 के नियम11 के अन्तर्गत अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति, उसके आश्रित तथा साक्षियों को यात्रा भत्ता, दैनिक भत्ता, भरण-पोषण व्यय और परिवहन सुविधाएं देय हैं-

  1. अत्याचार से पीडि़त प्रत्येक व्यक्ति, उसके आश्रित और साक्षियों को उसके आवास अथवा ठहरने के स्थान से अधिनियम के अधीन अपराध के अन्वेषण या सुनवाई या विचारण के स्थान तक का एक्सप्रेस/मेल/यात्री ट्रेन में द्वितीय श्रेणी का आने-जाने का रेल भाड़ा अथवा वास्तविक बस व टैक्सी भाड़े का संदाय किया जाएगा।
  2. जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा कोई अन्य कार्यपालक मजिस्टेªट, अत्याचार से पीडि़त व्यक्तियों और साक्षियों को, अन्वेषण अधिकारी, पुलिस अधीक्षक/ पुलिस उप अधीक्षक, जिला मजिस्टेªट या किसी अन्य कार्यपालिका मजिस्ट्रेट के पास जाने के लिए परिवहन सुविधाएं देने अथवा उसके पूरे संदाय की प्रतिपूर्ति की आवश्यक व्यवस्था करेंगे।
  3. प्रत्येक महिला साक्षी, अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति या उसकी आश्रित महिला या अव्यस्क व्यक्ति, साठ वर्ष की आयु से अधिक का व्यक्ति और 40 प्रतिशत या उससे अधिक का निःशक्त व्यक्ति अपनी पसंद का परिचर अपने साथ लाने का हकदार होगा। परिचर को भी इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध की सुनवाई, अन्वेषण और विचारण के दौरान बुलाए जाने पर साक्षी अथवा अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति को देय यात्रा और भरण-पोषण व्यय का संदाय किया जाएगा।
  4. साक्षी, अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति या उसका/उसकी आश्रित तथा परिवार को अपराध के अन्वेषण, सुनवाई और विचारण के दौरान उसके आवास अथवा ठहरने के स्थान से दूर रहने के दिनों के लिए ऐसी दरों पर दैनिक भरण-पोषण व्यय का संदाय किया जाएगा जो उस न्यूनत्तम मजदूरी से जैसा कि राज्य सरकार के कृषि श्रमिकों के लिए नियत की हो, कम नहीं होगा।
  5. साक्षी, अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति(अथवा उसका/उसकी आश्रित) और परिचर को दैनिक भरण-पोषण व्यय के अतिरिक्त आहार व्यय का भी ऐसी दरों पर संदाय किया आएगा जैसा कि राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर नियत करंे।
  6. पीडि़त व्यक्तियों, उनके आश्रितों/परिचर तथा साक्षियों को अन्वेषण अधिकारी या पुलिस थाना के भारसाधक अथवा अस्पताल प्राधिकारियों या पुलिस अधीक्षक/उप पुलिस अधीक्षक अथवा जिला मजिस्ट्रेट या किसी अन्य संबंधित अधिकारी के पास अथवा विशेष न्यायालय जाने के दिनों के लिए यात्रा भत्ता, दैनिक भत्ता, भरण पोषण व्यय तथा परिवहन सुविधाओं की प्रतिपूर्ति जिला मजिस्ट्रेट अथवा उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा किसी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा तुरंत अथवा अधिक से अधिक तीन दिनों में किया जाएगा।
  7. जब अधिनियम की धारा 3 के अधीन कोई अपराध किया गया है तो जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा कोई अन्य कार्यपालिका मजिस्ट्रेट, अत्याचार से पीडि़त व्यक्तियों के लिए औषधियों, विशेष परामर्श, रक्तदान, बदलने के लिए आवश्यकक वस्त्र, भोजन और फलों के लिए संदाय की प्रतिपूर्ति करेंगे।
अधिक जानकारी के लिए जिला कलेक्टर/जिला अधिकारी सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से सम्पर्क करें।

नागरिकों के मूल अधिकार

भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसमें प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 14 से 32 तक में इन मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार नागरिकों के मुख्य-मुख्य मूल अधिकार निम्नलिखित हैः-
  1. समता का अधिकार
    संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत नागरिकों को समता का मूल अधिकार प्रदान किया गया है। इसके अनुसार-
    क- किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता एवं
    ख- विधि के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जायेगा।
  2. धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध
    संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य द्वारा किसी नागरिक के विरूद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जायेगा। इन आधारों पर किसी भी व्यक्ति को दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों, सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों, तालाबों, कुओं, स्नानघाटांे, सड़कों आदि के उपयोग से वंचित नहीं किया जायेगा।
  3. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता
    अनुच्छेद 16 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि राज्य के अधीन किसी पद या नियोजन या नियुक्ति के संबध में सभी नागरिकों के लिये अवसर की समता होगी अर्थात् किसी भी व्यक्ति के साथ नियोजन अर्थात् रोजगार के मामलों में मात्र धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  4. छुआछूत का अन्त
    अनुच्छेद 17 के द्वारा अस्पृश्यता अर्थात् छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। किसी भी व्यक्ति से बरती छुआछूत नहीं बरती जाएगी और छुआछूत करने वाले व्यक्ति को विधि के अनुसार दंडित किया जा सकेगा।
  5. उपाधियों का अन्त
    अनुच्छेद 18 के अन्तर्गत सेना अथवा विद्या संबंधी सम्मान अर्थात् उपाधियों को छोड़कर शेष सभी उपाधियों का अन्त कर दिया गया है।
  6. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
    अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है अर्थात् प्रत्येक नागरिक को अपने विचार अभिव्यक्त करने एवं विचारों का आदान प्रदान करने की स्वतंत्रता होगी। इसमें प्रेस की स्वतंत्रता एवं सूचना प्राप्त करने की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है।
  7. सम्मेलन करने की स्वतंत्रता
    अनुच्छेद 19 (1) (ख) के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को शान्तिपूर्वक एवं अस्त्र-शस्त्र रहित सम्मेलन आदि करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।
  8. संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता
    अनुच्छेद 19 (1) (ग) के अन्तर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को संघ अथवा संगठन बनाने, उन्हें चालू रखने अथवा समाप्त करने आदि की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।
  9. भारत में भ्रमण आदि करने की स्वतंत्रता
    अनुच्छेद 19 (1) (घ) के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को भारत के सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र में सर्वत्र विचरण अर्थात् भ्रमण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसमें एक राज्य दूसरे राज्य में तथा एक ही राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान में विचरण करने की स्वतंत्रता सम्मिलित है।
  10. निवास करने की स्वतंत्रता
    अनुच्छेद 19 (1) (ड़) में भारत के नागरिक का भारत के किसी भी राज्य क्षेत्र मंे निवास करने एवं बस जाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।
  11. व्यापार अथवा कारोबार करने की स्वतंत्रता
    अनुच्छेद 19 (1) (छ) के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को अपनी रूचि का व्यापार, व्यवसाय, वृत्ति अथवा कारोबार आदि करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। यहीं यह भी उल्लेखनीय है कि ये स्वतंत्रताएं निरपेक्ष अर्थात् अबाध नहीं है। इन स्वतंत्रताओं पर देश की एकता एवं अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, सदाचार, मानहानि, अपराध उद्दीपन अथवा न्यायालय अवमान आदि आधारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
  12. दोषसिद्धि के संबंध मंे संरक्षण
    अनुच्छेद 20 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि-
    क- किसी भी व्यक्ति को ऐसे किसी कृत्य के लिए दण्डित किया जा सकेगा, जो तत्समय किसी विधि के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध न हो,
    ख- किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिये एक से अधिक बार अभियोजित एवं दण्डित नहीं किया जाएगा एवं
  13. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता अर्थात् जीवन जीने का अधिकार
    संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को दिया गया यह एक महत्वपूर्ण मूल अधिकार है। इसके अनुसार, किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जायेगा। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार है।
    हमारे उच्चत्तम न्यायालय ने खड़कसिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (एआईआर 1963 सु. को. 1995) के मामले में यह कहा है कि- जीवन जीने के अधिकार से अभिप्राय सम्मानजनक एवं मानव गरिमायुक्त जीवन जीने से है। इस अधिकार में समय-समय पर हमारी न्यायपालिका द्वारा भी कई अधिकारों को जोड़ा गया है, जैसे-
    क- एकान्तता का अधिकार
    ख- आवास का अधिकार
    ग- पर्यावरण संरक्षण का अधिकार
    घ- शीघ्र न्याया पाने का अधिकार
    ड़- निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार
    च- चिकित्सा का अधिकार
    छ- शिक्षा का अधिकार आदि।
  14. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार
    संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष तक के बालकों के लिये निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है।
  15. गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण अनुच्छेद 22 के अन्तर्गत गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को निम्नांकित संरक्षण प्रदान किये गये हैं-
    क- उसे गिरफ्तारी के कारणों से अवगत कराया जायेगा।
    ख- उसे किसी अधिवक्ता से परामर्श करने का अवसर प्रदान किया जायेगा तथा
    ग- उसे गिरफ्तार किये जाने के पश्चात् 24 घंटे के भीतर निकटत्तम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जायेगा।
  16. शोषण के विरूद्ध अधिकार
    अनुच्छेद 23 एवं 24 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि-
    क- किसी भी व्यक्ति से बेगार नहीं ली जाएगी,
    ख- उससे बलात् श्रम नहीं लिया जाएगा एवं
    ग- 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों आदि में नियोजित नहीं किया जाएगा।
  17. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
    संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने अन्तःकरण के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने तथा उसका प्रचार-प्रसार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।
    दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि हमारे संविधान में किसी भी व्यक्ति पर किसी धर्म विशेष को नहीं थोपा गया है। सिक्खों को कृपाण लेकर चलने की स्वतंत्रता है।
  18. अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण
    संविधान के अनुच्छेद 29 के अन्तर्गत भारत में निवासी नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाये रखने का अधिकार प्रदान किया गया है।
  19. संवैधानिक उपचारों का अधिकार
    अनुच्छेद 32 एवं 226 के अन्तर्गत नागरिकों का संवैधानिक उपचारों का एक महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किया गया है। इस अधिकार के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रवर्तन के लिये उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है। ऐसी याचिकाएं निम्नांकित हो सकती हैं-
    क- बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका
    ख- परमादेश याचिका
    ग- प्रतिषेध याचिका
    घ- अधिकारपृच्छा याचिका एवं
    ड़- उत्प्रेषण याचिका।
    संविधान निर्माता डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 के संविधान का एक महत्वपूर्ण अनुच्छेद एवं उसकी आत्मा बताया है।

बालकों के कानूनी अधिकार

बालक देश का भविष्य है। वही देश का भाग्य निर्माता है। देश का समग्र विकास बालकों पर निर्भर है। ऐसा कहा जाता है कि जैसा आज का बालक होगा वैसा ही कल का भारत होगा। अतः बालकों का शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक दृष्टि से सुदृढ़ एवं सुसंस्कारित होना आवश्यक है। यही कारण है कि बालकों के सर्वांगीण विकास के लिये भारत के संविधान और कानूनों में उन्हें कई महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किए गए हैं और उनके हितों को संरक्षण प्रदान किया गया है। यहाँ कुछ कानूनी अधिकारों का उल्लेख किया जा रहा है।
  1. जीवन जीने का अधिकारः
    हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रत्येक व्यक्ति को, जिसमें बालक भी सम्मिलित है, जीवन जीने का अधिकार प्रदान किया गया है। इतना ही नहीं उसे सम्मानजनक एवं मानव गरिमा युक्त जीवन जीने का अधिकार है। बालक को इस अधिकार से अवैध रूप से वंचित नहीं किया जा सकता। राज्य का यह कत्र्तव्य है कि वह बालक की बुनियादी आवश्यकताओें को पूरा करें।
  2. निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकारः
    छः वर्ष से चैदह वर्ष के प्रत्येक बालक को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा में प्रत्येक बालक को निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान करने की राज्य द्वारा गारन्टी दी गई है। अभिभावकों का भी यह कर्तव्य है कि वे अपने बालकों को शिक्षा के लिये विद्यालय में प्रवेश कराएंगे।
  3. दण्ड से मुक्ति का अधिकारः
    छोटे बालकों अर्थात् शिशुआंे को आपराधिक मामलों में दण्डित नहीं किया जा सकता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा82 में यह कहा गया है कि सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य अपराध नहीं है और उसे ऐसे कार्य के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता है। 7 से 12 वर्ष तक की आयु के बालक अथवा शिशु केवल तभी दण्डित किया जा सकता है जब उसे अपने द्वारा किये गये कार्य प्रकृति का ज्ञान रहा हो।
  4. शोषण के विरूद्ध अधिकारः
    संविधान के अनुच्छेद 23 व 24 में यह कहा गया है कि किसी भी बालक का न तो शोषण किया जायेगा और न ही उससे बेगार ली जा सकती है। उनका अनैतिक व्यापार अर्थात् यौन-शोषण भी नहीं किया जा सकता। अब बालकों को बन्धुआ मजदूर भी नहीं बनाया जा सकता है।
  5. कारखानों में नियोजन से सुरक्षाः
    कारखाना अधिनियम और संविधान के अनुच्छेद 24 में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों,खानों व अन्य जोखिम भरे कार्यों में नियोजित नहीं किया जायेगा। इसका स्पष्ट अभिप्राय यह हुआ कि बालकों से कठोर श्रम नहीं लिया जाए ताकि उनका शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास हो सके।
  6. भरण-पोषण का अधिकारः
    प्रत्येक बालक को अपने माता-पिता से भरण-पोषण का अधिकार उपलब्ध है। दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 में यह कहा गया है कि प्रत्येक माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वह अपने बालकों का भरण-पोषण करें। जब तक बालक आजीविका कमाने योग्य नहीं हो जाता तब तक माता-पिता उसकी परवरिश करने के लिये उत्तरदायी हैं। यदि कोई बालक विकलांग है, मंद बुद्धि है, अथवा बालिका अविवाहिता है, तब भी माता-पिता का दायित्व है कि उसका भरण-पोषण करे।
  7. बालक के कल्याण को सर्वोपरि माने जाने का अधिकारः
    हिन्दू विधि एवं अन्य सभी विधियों में इस बात की व्यवस्था की गई है कि जब भी बालक को किसी व्यक्ति की अभिरक्षा में दिया जाना हो तब उसके कल्याण को सर्वोपरि महत्व दिया जायेगा अर्थात् जहाँ बालक का कल्याण सुरक्षित हो वहीं बालक को अभिरक्षा में सौपा जायेगा। यह आवश्यक नहीं है कि बालक को केवल पिता की अभिरक्षा में ही सौंपा जाये। यदि माता अथवा कोई नातेदार उसकी अच्छी परवरिश कर सकता है तो उसे उनकी अभिरक्षा में दिया जा सकता है।
  8. बाल विवाह से बचने का अधिकारः
    बाल विवाह निषेध कानून, 2006 बाल विवाह पर रोक लगाता है। जब तक बालक की आयु 21 वर्ष और बालिका की आयु 18 वर्ष नहीं हो जाती तब तक उसका विवाह नहीं किया जा सकता है। यह कानून इसलिए बनाया गया है ताकि बालकों का सर्वांगीण विकास हो सके।
  9. किशोर न्याय का अधिकारः
    कई बार बालक अपराध कर बैठते हैं, लेकिन बालकों को अपराधी नहीं कहा जाता है। बालकों के लिये एक विशेष कानून किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 बनाया गया है। इस अध्निियम के अन्तर्गत बालकों को अपराधी नहीं कह कर अपचारी बालक अथवा विधि विरूद्ध किशोर की संज्ञा दी गई है। सामान्यतः ऐसे बालकों को कारावास का दण्ड नहीं दिया जाता है और उन्हें सुधार गृहों में भेज दिया जाता है। ऐसे बालकों को न हथकड़ी लगाई जाती है और न जेल में बंद रखा जाता है। बालकों में ऐसे व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया है जिनकी आयु 18 वर्ष से कम है।
  10. सम्पत्ति का अधिकारः
    हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अन्तर्गत प्रत्येक बालक को अपनी पैतृक सम्पत्ति में जन्मतः अधिकार प्रदान किया गया है। वह पैतृक सम्पत्ति में विधिनुसार हिस्सा पाने का हकदार है। वह भरण-पोषण, शिक्षा-दीक्षा आदि के खर्चे पाने का हकदार है।
  11. रैगिंग से सुरक्षा का अधिकारः
    इन दिनों विद्यालयों और महाविद्यालयों में रैगिंग का प्रचलन बढ़ रहा है। रैगिंग से अभिप्राय विद्यालयों में प्रवेश के समय कुछ पुराने विद्यार्थियों द्वारा नये विद्यार्थियों को शारीरिक एवं मानसिक यातना देने से है। कई बार यह सुनने में आता है कि प्रवेश के समय नये विद्यार्थियों को मुर्गा बनाया जाता है तथा उनके साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है। इससे परेशान होकर अनेक विद्यार्थी उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और कभी-कभी आत्म हत्या भी कर लेते हैैैं। अतः सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और राज्य सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों द्वारा रैगिंग पर रोक लगा दी गई है और इसके लिये दण्ड का प्रावधान भी किया गया है।
  12. दत्तक का अधिकारः
    बालक को दत्तक में लेने की प्रथा विद्यमान है। कोई भी निःसंतान व्यक्ति ऐसे बालक को दत्तक ले सकता है जो हिन्दू है, जो पहले से दत्तक में नहीं गया है, जिसने 15 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है और जो अविवाहित है, लेकिन जहाँ प्रथा हो वहाँ 15 वर्ष से कम आयु के बालक को और विवाहित व्यक्ति को भी दत्तक में लिया जा सकता है। जब कोई बालक दत्तक ले लिया जाता है तब उसे दत्तक परिवार में सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् उसे वे सभी अधिकार मिल जाते हैं जो एक प्राकृतिक पुत्र या पुत्री को मिले होते हैं।
  13. संवैधानिक संरक्षणः
    हमारे संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार प्रदान किया गया है। जाति, धर्म, वर्ग, लिंग आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं कियाजा सकता है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 15 में बालकों के लिये एक विशेष व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 15 में यह कहा गया है कि राज्य बालकों के कल्याण के लिये एक विशेष कानून बना सकेगा।
इस प्रकार विधान और संविधान में बालकों को अनेक कानूनी अधिकार प्रदान किये गये हैं। बालक अपने इन अधिकारों को जानें, इनका उपयोग करें तथा स्वयं को बेहतर नागरिक बनाने का प्रयास करें।

शिक्षा का अधिकार

संविधान के 86 वें संशोधन अधिनियम द्वारा वर्ष 2002 में संविधान में अनुच्छेद 21 जोड़कर 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का मूल अधिकार दिया गया है। तत्पश्चात ही बालकों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने के उदेश्य से निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा ‘‘बालकों का अधिकार अधिनियम 2009’’ भारतीय संसद ने पारित किया जिसे 1 अप्रेल 2010 से लागू कर दिया गया है।
अधिनियम की आवश्यक बातेंः
  1. प्रत्येक बच्चे को जिसकी उम्र 6 से 14 वर्ष है पड़ोस के स्कूल में निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।
  2. राज्य सरकार एवं स्थानीय प्राधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे समुचित मात्रा में स्कूल खोलें।
  3. किसी भी बच्चे से केपिटेशन फीस वसूल नहीं की जा सकती न ही उसका कोई सक्रीनिंग टेस्ट लिया जा सकता है। इन प्रावधानों का उल्लंघन करने पर स्कूलों पर जुर्माना अधिरोपित किया जा सकेगा। स्कूलों द्वारा बच्चों को एडमिशन से इंकार नहीं किया जा सकता है।
  4. किसी भी बच्चे को शारीरिक या मानसिक दण्ड नहीं दिया जा सकता है।
  5. उक्त प्रावधान सभी स्कूलों पर लागू होते हैं, चाहे वे सरकारी हो या सरकार से अनुदान प्राप्त करते हों या प्राईवेट हो।
  6. सरकारी या सरकार से अनुदान प्राप्त स्कूलों में स्कूल मैनेजमेन्ट कमेटी बनाई जायेगी जिसके तीन चैथाई सदस्य बच्चों के माता-पिता होंगे तथा कमिटी में 50 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ होंगी।
  7. उक्त कमिटी स्कूल विकास के लिए योजना तैयार करेगी।
  8. शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जा सकेगा और ना ही वे प्राईवेट ट्यूशन कर सकते है।
  9. बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक राष्ट्रीय आयोग बनाया जायेगा। सभी राज्यों में आयोग बनेंगे।
  10. उक्त अधिनियम के तहत अधिकारों की सुरक्षा के लिए नगर पालिका, नगर परिषद्, जिला-परिषद् में प्रार्थना पत्र पेश किया जा सकता है।
  11. सभी माता-पिताओं का यह दायित्व होगा कि वे बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल में दाखिल करवाएँ।
  12. प्राइवेट स्कूलों को भी 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करनी होगी।
  13. प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने से पूर्व किसी भी बच्चे को स्कूल से निकाला नही जा सकेगा।
  14. राज्य सरकार को राज्य स्तर पर स्टेट एटवाईजरी कमेटी बनानी होगी।
  15. केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय एडवाईजरी कमेटी बनेगी, जिनका कार्य केन्द्रीय सरकार को शिक्षा के विषय में सलाह देना होगा।
  16. केन्द्रीय सरकार ने उक्त अधिनियम को लागू करने के उद्देश्य से नियम भी बना दिए है।

सूचना का अधिकार यानि की जनता का अधिकार

-- जेठाराम जयपाल, व्याख्याता, राज.महाविद्यालय मेड़ता सिटी

सूचना का अधिकार जन साधाराण को दिया गया एक अमूल्य उपहार है। इस अधिनियम को 12 अक्टूबर 2005 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर शेष समस्त भारत क्षेत्र लागू कर दिया गया है। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य शासन प्रशासन के कार्य में पारदर्शिता लाना तथा उत्तरदायित्व स्थापित करना है। इस विधि का विस्तार 6 अध्यायों के अन्तर्गत 31 धाराओं, उनकी उपराधाओं तथा दो अनुसूचियों में है।
सूचना की परिभाषा - सूचना का आशय किसी भी तरह की ऐसी सामग्री से है जिससे रिकार्ड, दस्तावेज, ई-मेल, मत, प्रेस, विज्ञप्तियाँ, सर्कुलर, आदेश, लाॅग बुग, रिपोर्ट, पेपर, सैम्पल, माॅडल, इलेक्ट्रोनिक डाटा आदि शामिल हैं और जो किसी भी निजी संस्था से इस प्रकार सम्बन्धित हो कि किसी कानून के जरिए किसी लोक प्राधिकारी की पहुंच संभव हो सकती हो।

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत

आप पंचायत से लेकर राष्ट्रपति महोदय के दफ्तर तक सभी सरकारी कार्यालयों/गैर सरकारी अनुदान प्राप्त संस्थाओं से सूचना ले सकते है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन के हर दफ्तर में सूचना देने पर लोक सूचना अधिकारियों को नियुक्त किया गया है। हर लोक सूचना अधिकारी आपको सूचना देने के लिए बाध्य है।
अब आप -
- किसी भी सरकारी फाइल या दस्तावेज का निरीक्षण कर सकते है।
- किसी भी लोक निर्माण कार्य का निरीक्षण कर सकते है।
- किसी भी दस्तावेज की प्रमाणित काॅपी या उद्वरण ले सकते है।
- किसी भी सामग्री के प्रमाणित नमूने ले सकते है।
- इलेक्ट्रोनिक माध्यम में उपलब्ध जानकारी की प्रति ले सकते है।
- उपर बतायी गयी जानकारी के अलावा अन्य प्रकार की सूचनायें भी लोक सूचना अधिकारी से प्राप्त की जा सकती है। जैसे कोई भी अभिलेख, ज्ञापन, राय, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति आदेश, लाॅगबुक, काॅन्ट्रेक्ट रिपोर्ट, नमूने, आंकड़े, माॅडल आदि।

विभागों द्वारा स्वघोषित सूचनायें -

हर सरकारी कार्यालयों की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने विभाग के विषय में निम्नलिखित सूचनायें जनता को स्वयं दे। अपने विभाग के कार्यों और कत्र्तव्यों का विवरण। अधिकारी एवं कर्मचारियों के नाम, शक्तियां एवं वेतन। विभाग के दस्तावेजों की सूची। सभी योजनाओं के लिए प्रस्तावित बजट आवंटित धनराशि, तत्पसम्बन्धी रिपोर्ट। लाभार्थियों की सूची, रियासतें और परमिट लेने वालों का ब्यौरा। लोक सूचना अधिकारी का नाम व पता।

सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया

सूचना पाने के लिए सरकारी कार्यालय में नियुक्त लोक सूचना अधिकारी के पास आवेदन जमा करे। आवेदन पत्र जमा कराने की पावती जरूर लें। आवेदन पत्र के साथ आवेदन शुल्क/ फीस देना जरूरी है जो रूपये 10 के पोस्टल आर्डर/ नकद जमा कराए जा सकते है। प्रतिलिपि/ नमूना इत्यादि के रूप में सूचना पाने के लिए निर्धारित शुल्क देना जरूरी है। रजिस्टर्ड डाक द्वारा भी आवेदन भेजे जा सकते है।

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अन्तर्गत आवेदन पत्र का प्रारूप

सेवा में,
राज्य लोक सूचना अधिकारी/ सहायक लोक सूचना अधिकारी
(विभाग/ कार्यालय का नाम पता, जहां से सूचना मांगी जा रही है।)
(अ) आवेदक का नाम
(ब) पताः
(स) चाही गई जानकारी का विवरण, चाही गई जानकारी की विषय वस्तु, सूचना जिस काल/ अवधि से संबंधित है माह तथा वर्ष, जानकारी का ब्यौरा, जानकारी कैसे प्राप्त करना चाहेंगे स्वयं या डाक द्वारा, (डाक शुल्क अतिरिक्त शुल्क के साथ संदेय होगा।), अगर डाक द्वारा चाहते है तो किसी एक को चिन्हित करें। (सामान्य, रजिस्टर्ड, स्पीड पोस्ट) (द) क्या आवेदक गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवार के है (अगर है तो सबूत संलग्न करें)

सूचना देने की अवधि

सूचना देने कराने की समय सीमा- 30 दिन, जीवन/ स्वतंत्रता से संबंधित आवेदन- 48 घंटे
तृतीय/ स्वतंत्रता पक्ष से संबंधित आवेदन- 40 दिन, मानव अधिकार के हनन/ भ्रष्टाचार से संबंधित आवेदन- 45
(सैनिक एवं अर्ध सैनिक बलो द्वारा)
सहायक लोक सूचना अधिकारी को प्रस्तुत आवेदन- 35 दिन

निर्धारित अवधि में सूचना न मिलने पर क्या करें

यदि आपको समय सीमा में सूचना नही मिलती है। तब आप अपनी पहली अपील विभाग के अपीलीय अधिकारी को सूचना, न मिलने के 30 दिनों के अन्दर कर सकते है।
निर्धारित समय सीमा पर सूचना न मिलने पर आप राज्य या केन्द्रीय सूचना आयोग को सीधी शिकायत भी कर सकते है। अगर आप पहली अपील से असंतुष्ट है तब आप दूसरी अपील अपील के फैसले के 90 दिन के अन्दर राज्य या केन्द्रीय सूचना आयोग से कर सकते है।

यदि आप प्राप्त सूचना से असंतुष्ट है तो अपील करें-

अपीलीय अधिकारी विभाग का नाम एवं पता।
लोक सूचना अधिकारी जिसके विरूद्ध अपील कर रहे है उसका नाम व पता।
आदेश का विवरण जिसके विरूद्ध अपील कर रहे है उसका नाम व पता।
आदेश का विवरण जिसके विरूद्ध अपील कर सकते है।
अपील का विषय एवं विवरण
अपीलीय अधिकारी से किस तरह की मदद चाहते है।
अपीलार्थी का नाम, हस्ताक्षर एवं पता।
आदेश फीस, आवेदन से संबंधित सारे कागजात की प्रतिलिपि लगाएं।

सूचना न देने पर क्या सजा है

लोक सूचना अधिकारी आवेदन लेने से इन्कार करता है सूचना देने से मना करता है या जानबूझकर गलत सूचना देता है, तो उस पर प्रतिदिन रू. 250 के हिसाब से कुल रू. 25,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

आपको जो सूचनाएं नही मिलेंगी

जो भारत की प्रभूता, अखण्डता, सुरक्षा, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों व विदेशी संबंधों के लिए घातक हो। जिससे आपराधिक जांच पड़ताल, अपराधियों की गिरफ्तारी या उन पर मुकदमा चलाने में रूकावट पैदा हो। जिससे किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा खतरे में पड़े। जिससे किसी व्यक्ति के निजी जिन्दगी में दखल-अंदाजी हो और उसका जनहित में कोई लेना देना ना हो।

सूचना प्राप्त करने के लिए निर्धारित शुल्क

आवेदन शुल्क- रू. 10/- केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा समान शुल्क निर्धारित।
अन्य शुल्क- ए-4 या ए-3 के कागज के लिए रू. 2/- प्रति पेज एवं बड़े आकार के कागज/ नमूना के लिए वास्तविक मूल्य व फ्लापी या सीडी के लिए रू. 50/- केन्द्र व राज्य सरकार में समान शुल्क निर्धारित।
रिकार्ड निरीक्षण का शुल्क- पहला घंटा निःशुल्क, तत्पश्चात हर घंटे के लिए 5/- रूपये प्रति घंटा व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा समान शुल्क निर्धारित।
अदायगी- नकद/ बैंक डाफ्ट/ बैंकर्स चैक/ पोस्टल आर्डर के रूप में अदायगी केन्द्र सरकार व राजस्थान सरकार में।

केन्द्र सूचना आयोग

ब्लाॅक नं. 4, पांचवी मंजिल, पुराना जे.एन.यू. कैम्पस, नई दिल्ली- 110067
वेबसाइट- www.cic.gov.in - फोन/ फैक्स 011-26717354

राजस्थान सूचना आयोग

हरीशचन्द माथुर, राजस्थान लोक प्रशासन संस्थान (ओ.टी.एस.), जवाहर लाल नेहरू मार्ग, जयपुर।
वेबसाइट- http//ric.rajasthan.gov.in

महिला अधिकार एवं कानून

-- शिल्पी दूदवाल, व्याख्याता, राज. कन्या महाविद्यालय,अजमेर

अपराध क्या है

एक अपराध किसी भी कार्य में हुई वह भूल है जो कानून के तहत दंडनीय महिलाओं के प्रति अपराधों में शामिल हैंः
बलात्कार, हत्या, गंभीर चोट
कोई भी अपमानजनक शब्द या अश्लीलता का संकेत जो महिलाओं को अपमानित करने के इरादे से किया गया हो।
कोई भी ऐसा शब्द या संकेत जो महिलाओं को अपमानित करता हो।
अपहरण करना और महिला को जबरन शादी के लिए मजबूर करना।
किसी नाबालिग लड़की को किसी व्यक्ति के साथ जबरन संभोग के लिए मजबूर करना, बेचना, वेश्यावृत्ति के इरादे से
उसकी खरीद फरोक्त करना।
दहेज मांग करना, दहेज देना और दहेज लेना।
किसी भी महिला पर उसके पति या उसके किसी रिश्तेदार द्वारा अत्याचार किया जाना दहेज हत्या आदि।
किसी विवाहित महिला को अपराधिक इरादे से हिरासत में लेना, पति या पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह करना।

पुलिस को सूचना

यदि किसी भी व्यक्ति को अपराध की शिकार महिला या अपराध की जानकारी है तो वह इसकी सूचना नजदीक के पुलिस स्टेशन में दे सकता है या आयोग को दे सकता है। यह शिकायत लिखित में होनी चाहिए। यह एफ.आई.आर. या प्रथम सूचना रिपोर्ट कहलाएगी।
प्रथम सूचना रिपोर्ट में अपराधी का नाम, पता, तिथि, स्थान और अपराध होने का समय गवाहों की पहचान और अन्य सभी ब्यौरों का विवरण होना चाहिए।

पुलिस का कत्र्तव्य

पुलिस का यह कत्र्तव्य है कि किसी भी व्यक्ति द्वारा दी गई सूचना को रजिस्टर में दर्ज करें।
किसी व्यक्ति द्वारा जानकारी मौखिक रूप में दी जाती है तो अधिकारी या पुलिस स्टेशन के प्रभारी को कत्र्तव्य है कि वह उस व्यक्ति के बताए अनुसार उसे रजिस्टर में लिखे।
उस व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी को सूचना समझा जाए। प्राथमिकी में सभी प्रासंगित तथ्यों को शामिल किया जाना चाहिए।
जितना संभव हो सके प्राथमिकी जल्द से जल्द दर्ज की जानी चाहिए। यह भी आवश्यक है कि सभी साक्ष्य लिए जाए ताकि अपराधी को गिरफ्तार किया जा सके।
यदि कोई व्यक्ति गैर-संज्ञेय अपराध के बारे में पुलिस अधिकारी या आयोग को इसकी जानकारी देता है इस तरह की जानकारी को प्रयोजन हेतु विशेष रूप से दर्ज किया जाए। कोई भी व्यक्ति गैर-संज्ञेय अपराध की सीधे लिखित या मौखिक रूप में मजिस्ट्रेट को दे सकता है।
यदि कोई गैर-संज्ञेय अपराध आम तौर पर निजी या गलत, व्यक्तिगत अपराध की प्रकृति का है तो पुलिस जब तक उस की जाँच नहीं करेगी जब तक किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसे ऐसा करने का आदेश न दिया जाए।

हमें क्या करना चाहिए

यदि कोई पुलिस अधिकारी या पुलिस स्टेशन प्रभारी सूचना को दर्ज करने के लिए मना करता है तो वह व्यक्ति जिला पुलिस अधीक्षक को इसकी जानकारी दे सकता है।
एक निजी शिकायत को भी मजिस्ट्रेट तथ्य मान सकते है और मामले की प्रगति के बारे में जाँच अधिकारी को भी बुला सकते हैं।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न

जब कोई व्यक्ति किसी से स्पर्श, मुक्का मारने जैसे भौतिक अंतरंगता के अप्रिय कार्य करता है।
जब कोई व्यक्ति अप्रिय कार्य जैसे यौन संबंध (सीधे या निहितार्थ) हेतु मांग करता है।
जब कोई व्यक्ति किसी भी यौन प्रकृति के अप्रिय चित्र/कार्टून/पिन-अप कलेंडर कम्प्यूटरस्क्रीन पर कोई भी यौन-हिंसात्मक सामग्री अश्लील ई-मेल आदि प्रदर्शित करता है।

कार्यस्थल क्या है?

निर्माण स्थल, कारखाने, कार्यालय आदि कार्यस्थल हैं।

आपको क्या करना चाहिए

उत्पीड़न करने वाले व्यक्ति को तुरंत पकड़ना चाहिए। उसके लिए कोई बहाना नहीं करना चाहिए। यह वास्तव में लोगों को पता है कि वह क्या उत्पीड़न कर रहा है । यह बात सही है कि उन्हें यौन-उत्पीड़न रहा है। यह बात सही है कि उन्हें यौन-उत्पीड़न पर आपत्ति न कर नजरअंदाज करते है, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।
ध्यान हटाने की रणनीति से उत्पीड़न को नजरअंदाज न करें। आवाज उठाएं
यौन उत्पीड़न के बारे में आवाज उठाना एक प्रभावी कदम है। फलस्वरूप इससे जनता की राय एकजुट होती है।
उत्पीड़न की तुरंत संभव वरिष्ठ अधिकारी या पुलिस को रिपोर्ट करें। आप इसमें किसी भी गैर सरकारी संगठन की सहायता ले सकते हैं।

दहेज का अर्थ

दहेज का अर्थ है दुल्हन के द्वारा किसी भी मूल्यवान संपत्ति देना या फिर देने के लिए सहमत होना। दुल्हन पक्ष या दूल्हा दोनों ही शामिल हैं।
दुल्हन के माता-पिता या दूल्हे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा।
किसी भी समय शादी से पहले या बाद में।
नकद केश, सोना और किसी भी प्रकार की सम्पत्ति दहेज है।
दहेज लेना, दहेज देना या इस प्रकार का प्रचार करना अपराध है। कोई भी व्यक्ति या उसके रिश्तेदार जो अपने बेटे या बेटी की शादी में दहेज लेता या देता है, एक अपराध हैं। शादी के समय दुल्हे या दुल्हन को जो उपहार दिए जाते है हालांकि कानून उसे आज्ञा देता है, लेकिन यह आवश्यक है कि-
इन उपहारों की सूची लिखित में होनी चाहिए
उपहार देने वाले व्यक्ति का संक्षिप्त विवरण, व्यक्ति के नाम का उल्लेख किया जाना
उपहार के अनुमानित मूल्य का उल्लेख किया जाना
उपहार देने वाला व्यक्ति का नाम भी दिया जाना
दुल्हे अथवा दुल्हन से उसका क्या रिश्ता है
दुल्हा और दुल्हन द्वारा हस्ताक्षरित सूची
किसी व्यक्ति द्वारा दी गई वस्तु की कीमत उसकी वित्तीय स्थिति से अधिक मूल्य की नहीं होनी चाहिए
उपहार मांग कर या उस व्यक्ति को मजबूर करके नहीं लिया जाना।
यदि ऊपर लिखित शर्ते/ स्थिति नहीं है तो वह दहेज अधिनियम के दंडात्मक प्रवधानों में शामिल नहीं होगा।
दहेज किसी भी पक्ष से प्राप्त हुआ हो दहेज कानून में यह प्रावधान है कि वह स्त्री के लाभ के लिए होगा और उसे उस स्त्री या उसके वारिसों को सौंप दिया जाएगा।

दहेज देने के लिए सजा है

कम-से-कम पांच साल का कारावास या 15,000/- जुर्माना
यदि दहेज की रकम 15,000/- से ज्यादा है तो जुर्माने की रकम दहेज की रकम के बराबर हो सकती है।
यद्यपि दहेज देना/लेना एक कानून जुर्म है लेकिन किसी भी व्यक्ति द्वारा दिया गया केवल बयान के लिए ऐसा व्यक्ति अधीन नहीं होगा।
दहेज मांगने की सजा कोे 6 महीने से 2 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है और इसके लिए 10,000 रूपये तक जुर्माना हो सकता है।

क्रूरता

क्रुरता की सजा आई.पी.सी. की धारा 498-ए के तहत दी जा सकती है। इसमें निम्नलिखित शामिल है-
यदि महिला के पति या उसके रिश्तेदार उस क्रूरता में शामिल है तो वे 3 वर्ष की सजा और जुर्माने के हकदार है, यह सजा बढ़ाई भी जा सकती है।
किसी महिला को पीटना या उसको ऐसी चोट पहंुचाना जो उसके जीवन के लिए खतरा बन जाए या उसे आत्महत्या करने की तरफ ले जाए।
मानसिक और शारीरिक क्रूरता और अत्याचार में शामिल है उसे धमकी देना, बल प्रयोग करना, उसके रिश्तेदारों द्वारा संपत्ति और पैसे की मांग करना आदि महिला उत्पीड़न है।
विवाहित महिला या उसके खिलाफ आई.पी.सी. की धारा 498-ए के तहत दहेज अधिनियम के खिलाफ अपने आप या या किसी मान्यता प्राप्त कल्याण संगठन के माध्यम से भी शिकायत कर सकते है।
दहेज हत्या धारा 304-बी. आई.पी.सी. निम्नलिखित स्थिति में दहेज हत्या के मामले है यदि उनकी संतुष्टि होती हैः
यदि किसी महिला की मौत जलने के कारण शारीरिक चोट के कारण या अस्वाभाविक परिस्थितियों में होती है और मौत
ऐसे मामलों में महिला के पति और उसके परिवार जिम्मेदार ठहराया जाएगा और इसके लिए उन्हें 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।
यदि विवाहित महिला के मौत से पहले यह दर्शाता है कि उसके पति या किसी भी रिश्तेदार द्वारा दहेज की मांगी की गई है और उस पर क्रूरता या उत्पीड़न हुआ है तो इस प्रकार की मौत को मौत माना जाएगा।
इस अधिनियम के तहत प्रत्येक राज्य सरकार में दहेज प्रतिषेध अधिकार (डी.पी.ओ.) की नियुक्ति की है।
डी.पी.ओ. का कत्र्तव्य है कि वह अधिनियम के प्रावधानों को देखंे।

आपको क्या करना चाहिए?

इसकी शिकायत आप दहेज प्रतिषेध अधिनियम रोकथाम प्राधिकरण, पुलिस और राष्ट्रीय महिला आयोग को कर सकते है।

घरेलू हिंसा

परिवार का मतलब है वह सुरक्षा प्रदान करे, लेकिन जब घर का वातावरण हिंसक हो जाता है और उससे महिला पीडि़त होती है। घरेलू हिंसा में गाली-गलोच करना, शारीरिक, यौन, भावनात्मक, आर्थिक और मानसिक आदि शामिल है। महिला को डराना, धमकाना, आतंकित करना, उस पर दोष लगाना या उसे घायल करना आदि शामिल है।

घरेलू हिंसा के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैः

नाम से पुकार कर अपमानित करना, लगातार उसकी आलोचना करना
ताने देकर अपमानित करना
नौकरी नहीं करने देना एवं उसे स्वावलंबी नहीं बनने देना
ऐसे कार्य स्त्री से कराना जिसे वह पसंद नहीं करती है
लड़कियों को शिक्षा के समुचित अवसर प्रदान नहीं कराना
स्त्री द्वारा कमाए गए धन पर अधिकार जमाना
छोटी-छोटी बातों पर शारीरिक चोट पहंुचाना जैसे धकेलना, थप्पड़ मारना, टकराना आदि मानसिक आघात पहँुचाना
दहेज के लिए परेशान करना
बेटा पैदा करने के लिए प्रताडि़त करना
शराब पी कर दुव्र्यवहार करना

एन.आर.आई. पति द्वारा परित्यक्त करने के बाद क्या करना चाहिए

एन.आर.आई. विवाह संबंधी शिकायतों से निपटने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग को राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वय एजेंसी के रूप में नामित किया गया है।
भारत में विदेश में क्रास कंट्री विवाह और उससे संबंधित प्राप्त हुई शिकायतों के समाधान के लिए इसी संबंध में 24 सितम्बर, 2009 को एक एन.आर.आई. सेल का उद्घाटन किया गया जो कि किसी भी महिला को प्रथकीकरण से हुई हानि और उसके साथ हुए अत्याचारों के प्रति न्याय दिलाने के संबंध में हैं।
एन.आर.आई. सैल में शिकायतों के पंजीकरण उनकी अपनी प्रकृति निम्न आधार पर निर्भर करता है और उन शिकायतों के अनुरूप उन पर कार्यवाही की जाती हैः-
1. शिकायतकत्र्ता की शिकायत का संज्ञान लेकर संबंधित पार्टी को फोन द्वारा या समन भेज कर अपना जवाब देने के लिए और संबंधित पार्टी का आयोग द्वारा निर्धारित सीमा में उसका उत्तर देना होता है।
2. संबंधित पुलिस स्टेशन को उचित कार्यवाही करने के लिए पत्र लिख कर इस पर की गई कार्यवाही की रिपोर्ट मांगी जाती है। इस संबंध में दर्ज की गई शिकायत पर उचित कार्यवाही करने के लिए निर्देश दिए जाते हैं।
3. शिकायत को संबंधित भारतीय दूतावास को कार्यवाही के लिए भेजा जता है।
4. प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय को वारंट जारी करने या किसी भी आदेश के लिए विधिवत लिखित में उपयुक्त न्यायालय में भेज दिया जाता है।
5. प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय, (एम.ओ.आई.ए.) विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास को योजनानुसार पीडि़ता को वित्तीय सहायता, कानूनी सहायता के लिए लिख दिया जाता है।
6. पासपोर्ट से संबंधित मामलों के लिए पासपोर्ट प्राधिकरण को लिख दिया जाता है।
7. यदि आवश्यक हो तो पीडि़ता के प्रतिवादी के नियोक्ताओं को उसके पति के विरूद्ध आवश्यक कार्यवाही करने के लिए लिख जाता है।

राष्ट्रीय महिला आयोग, 4, दीन दयाल उपाध्याया मार्ग, नई दिल्ली-110002
फोनः 011-23236204

आवश्यक हैल्पलाईन फोन नं. -
पुलिस की तत्काल सहायता - 100

राजस्थान जनसुनवाई अधिकार अधिनियम

-- भंवरलाल सोलंकी, व्याख्याता, राजकीय महाविद्यालय आबुरोड़
मो. 9414792199

जनसुनवाई अधिकार अधिनियम-2012 जनसाधारण को दिया गया एक अमूल्य उपहार है। यह अधिनियम आम आदमी की समस्याओं तथा अभाव अभियोगों पर उनके अपने क्षेत्र में ही एक निश्चित समय सीमा में सुनवाई के अधिकार देता है। इस अधिनियम का नाम राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम 2012 है। इसका प्रसार सम्पूर्ण राजस्थान राज्य में ही होगा। इस अधिनियम को राजस्थान सरकार ने 1 अगस्त, 2012 से राज्य में लागू कर देश भर में एक पहल की है।

क्षेत्र - इस जन सुनवाई अधिनियम से

  1. राजस्थान लोक सेवा प्रदान की गारन्टी अधिनियम 2011 के लिए अधिसूचित 153 सेवाओं को प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों का समाधान होगा।
  2. राज्य एवं केन्द्र की सभी जन कल्याणकारी योजनाओं तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वन का लाभ प्राप्त करने में आमजन की कठिनाइयों का निराकरण होगा।
  3. समय लगने वाली प्रक्रिया को सुगम करने हेतु निर्धारित सुगम केन्द्रों से मदद तथा जवाबदेही के साथ निस्तारण की समयबद्ध व्यवस्था का निर्माण होगा।

राजस्थान सुनवाई अधिकार अधिनियम 2012 के तहत -

  1. जन शिकायत/परिवाद पर 15 दिवस में सुनवाई की अनिवार्यता हैं।
  2. शिकायतकत्र्ता के निवास स्थान के निकटतम स्थान पर सुनवाई की व्यवस्था है।
  3. ग्राम पंचायत, तहसील, उपखण्ड एवं जिला स्तर पर लोक सुनवाई अधिकारी एवं अपीलीय प्राधिकारियों की नियुक्ति की जावेगी।
  4. जिला स्तर पर अतिरिक्त जिला कलक्टर, संबंधित विभाग के जिला अधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, आयुक्त, नगर निगम/नगर परिषद की लोक सुनवाई अधिकारी के रूप में नियुक्ति की जावेगी।
  5. जिला कलक्टर, रीजनल अधिकारी, मेयर, अध्यक्ष नगर परिषद/नगर पालिका की अपीलीय अधिकारी के रूप में नियुक्ति होगा।
  6. प्रथम अपील पर निर्णय हेतु 21 दिवस की समय सीमा निर्धारित है।
  7. शिकायत /परिवाद आवेदन, अपील एवं निर्णय की संसूचना के प्रपत्रों का निर्धारण है।
  8. आवेदन पत्र एवं अपीलीय ज्ञापनों पर कोई शुल्क नही ंहोगा।
  9. शिकायत/परिवाद पर लिये गये निर्णय संसूचना 7 दिवस में देने की अनिवार्यता है।
  10. नियम-5 के द्वारा परिवाद संबंधित नहीं होने पर संबंधित लोक सुनवाई अधिकारी को परिवाद अन्तरण करने की व्यवस्था होगी।
  11. जनता की शिकायत का दक्षता और प्रभावी तरीके से निराकरण करने के प्रायोजनों के लिए और इस अधिनियम के अधीन परिवादों को प्राप्त करने के लिए सूचना और सुगम केन्द्रों की स्थापना का प्रावधान। जिसमें ग्राहक सेवा केन्द्र, काॅल सेन्टर, हेल्प डेस्क और जन सहायता केन्द्रों की स्थापना शामिल हो सकेगी।

अपील -

  1. समय पर सुनवाई नहीं होने या निर्णय से संतुष्ट नहीं होने पर 30 दिवस में द्वितीय अपील की व्यवस्था है। प्रथम अपील अधिकारी 30 दिवस की कालावधि की समाप्ति के पश्चात अपील ग्रहण कर सकेगा। यदि उसे यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी को समय पर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से रोका गया था।
  2. कोई भी व्यक्ति, जिसे नियम समय सीमा के भीतर सुनवाई का अवसर प्रदान नहीं किया जाता है या जो लोक सुनवाई अधिकारी के विनिश्चय से व्यथित है, नियत समय सीमा की समाप्ति से या लोक सुनवाई अधिकारी के विनिश्चिय की तारीख से तीस दिवस के भीतर प्रथम अपील अधिकारी को अपील फाइल कर सकेगा।
  3. प्रथम अपील अधिकारी के विनिश्चय के विरूद्ध द्वितीय अपील प्रथम अपील अधिकारी के विनिश्चय की तारीख से 30 दिवस के भीतर अपील अधिकारी को होगी।

शास्ति -

जहां द्वितीय अपील प्राधिकारी की यह राय है कि लोक सुनवाई अधिकारी बिना किसी पर्याप्त और युक्तियुक्त कारण से नियत सीमा के भीतर सुनवाई का अवसर प्रदान करने में विफल रहा है वहां वह उस पर शास्ति अधिरोपित कर सकेगा जो 500 रूपये से कम नहीं होगी किन्तु 5 हजार से अधिक नहीं होगी।
उपधारा (1) के अधीन द्वितीय अपील अधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति लोक सुनवाई अधिकारी के वेतन से वसूली होगी।
धारा 8 में शास्ति के विरूद्ध पुनरीक्षण याचिका दायर करने का प्रावधान।

सुनवाई नहीं तो रूपये 5 हजार जुर्माना -

ग्राम सेवक और पटवारी से लेकर नगर पालिका, नगर परिषद, नगर निगम, तहसील, बीडीओ, एसडीओ, जिला कलक्टर, जिला परिषद और संभागीय आयुक्त कार्यालय तक में 1 अगस्त, 2012 से सुनवाई का अधिकार कानून लागू हो गया है। इससे लोगों की सप्ताह में कम से कम दो दिन हर हाल में सुनवाई होगी। शिकायत होने पर सुनवाई अधिकारी के वेतन से जुर्माने के रूप में 500 से 5000 रूपये तक काटे जाएंगे। इनके अलावा अनुशासनात्मक कार्यवाही भी की जाएगी।

सुनवाई अधिकारी -

ग्राम पंचायत स्तर पर पटवारी व ग्राम सेवक, तहसील पर तहसीलदार, पंचायत समिति पर बीडीओ, उपखण्ड कार्यालय में एसडीओ, जिला स्तर पर एडीएम व सभी विभागों के जिला अधिकारी, जिला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी, नगर पालिका, नगर पालिका के अधिशाषी अधिकारी, नगर परिषद में आयुक्त, नगर निगम में सीईओ, संभाग स्तर पर अतिरिक्त संभागीय आयुक्त व सभी संबंधित विभागों के संभाग स्तर के अधिकारी।

अपीलीय अधिकारी -

पंचायत स्तर के राजस्व मामलों में तहसीलदार व अन्य मामलों में बीडीओ, तहसील स्तर के मामलों में एसडीओ, उपखण्ड स्तर के मामलों में जिला स्तरीय जान अभियोग व सतर्कता समितियों की उपसमितियां जिला स्तर पर कलेक्ट्रेट व जिला परिषद के मामले में कलेक्टर अन्य विभागों में संभाग स्तरीय अधिकारी, नगर निगम में मेयर, नगर पालिका में चेयरमैन व नगर परिषद में सभापित तथा संभाग स्तर के सभी कार्यालय के लिए संभागीय आयुक्त पहली अपील सुनेंगे।

द्वितीय अपीलीय अधिकारी -

पंचायत स्तर के मामलों में उपखण्ड स्तरीय जन अभियोग व सतर्कता समितियों की उपसमिति, तहसील, पंचायत समिति, नगर परिषद व नगर पालिका स्तर के मामलों में जिला जन अभियोग व सतर्कता समितियों की उपसमिति, उपखण्ड से लेकर जिला कलेक्ट्रेट, जिला परिषद सहित सभी जिला स्तरीय कार्यालयों के लिए संभागीय आयुक्त, नगर निगम के मामलों के लिए स्थानीय निकाय सचिव तथा संभागीय मुख्यालय के मामलों के लिए राजस्व मंडल या प्रमुख सचिव, संभाग स्तर के अन्य कार्यालयों के लिए संबंधित विभागों के सचिव दूसरी अपील सुनेंगे।

विधिक सेवा के उभरते आयाम - एक नजर

-- सूचना दाताः रमेश परिहार (एड़वोकेट), मेड़ता सिटी

विधिक सेवा में उपलब्ध निःशुल्क विधिक सहायता

- कानूनी सलाह
- पैरवी हेतु अधिवक्ता
- किसी भी कानूनी कार्यवाही के संबंध में देय या खर्च की गई कोर्ट फीस, प्रोसेस फीस तथा अन्य प्रभारों को भुगतान।
- कानूनी कार्यवाही में प्रमाणिक आदेशों तथा अन्य दस्तावेजों की प्रतियां निःशुल्क प्राप्त करना तथा देना।
- कानूनी कार्यवाही में दस्तावेजों की छपाई तथा अनुवाद कराना तथा अपील तैयार कराना।
- सभी न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालयों में लीगल एड काउन्सिल स्कीम के तहत पैरवी हेतु निःशुल्क अधिवक्ता की सेवा उपलब्ध है।

निःशुल्क विधिक सहायता हेतु पात्र व्यक्ति -

- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जन जाति वर्ग का व्यक्ति
- महिला एवं बालक
- ऐसा व्यक्ति जिनकी वार्षिक आय की सीमा 1,25000/- रूपये तक है।
- विचाराधीन बन्दी
- प्राकृतिक आपदाग्रस्त व्यक्ति
- मानसिक रूप से असमर्थ व्यक्ति
- औद्योगिक कर्मकार
- मानव दुव्र्यवहार व बेगारी से पीडि़त
- सभी किशोर न्याय बोर्डों में लीगल एड़ काउन्सिल स्कीम के तहत बाल अपराधियों की पैरवी हेतु निःशुल्क अधिवक्ता की सेवा उपलबध है।

निःशुल्क विधिक सहायता हेतु सम्पर्क स्त्रोत -

- ताल्लुका स्तर पर - अध्यक्ष, ताल्लुका विधिक सेवा समिति, (संबंधित ताल्लुका)
- जिला स्तर पर - अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अजमेर
- जिला एवं ताल्लुका स्तर पर प्राधिकरण द्वारा स्थापित किसी लीगल एड क्लीनिक में सम्पर्क
- उच्च न्यायालय स्तर पर सचिव, उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति (जोधपुर/जयपुर)

सचिव

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण

अध्यक्ष

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण